भीड़ में अकेलापन और 'सुनने वाले' की अहमियत | Author Piyush

क्या आप भी भीड़ में अकेलापन महसूस करते हैं? जानिए क्यों आज के डिजिटल दौर में एक अच्छे 'Listener' की ज़रूरत है। लेखक पीयूष के इस ब्लॉग में गहराई से समझें मानसिक सुकून के मायने और जानें 'Sukoon Talk' के बारे में।

SELF LOVE SYMPHONY

Author Piyush

1/16/20261 मिनट पढ़ें

भीड़ का शोर और सन्नाटा: क्या हम वाकई जुड़े हुए हैं?

​आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम 'कनेक्टेड' तो बहुत हैं, पर 'जुड़े' हुए बिल्कुल नहीं। हमारी उंगलियाँ स्क्रीन पर दिन भर स्क्रॉल करती हैं, हम सैकड़ों चेहरों को देखते हैं, उनकी खुशियों पर 'Like' का बटन दबाते हैं, लेकिन जब दिन ढलता है और हम फोन किनारे रखते हैं, तो एक अजीब सा खालीपन कमरे में तैरने लगता है।

दिखावे की संस्कृति और हमारा मनोविज्ञान

​मनोविज्ञान के छात्र के तौर पर जब मैं इस स्थिति का विश्लेषण करता हूँ, तो पाता हूँ कि हमने 'संख्या' को 'संबंध' मान लिया है। हमें लगता है कि सोशल मीडिया पर मौजूद फॉलोअर्स का आंकड़ा हमारे अकेलेपन का इलाज है। पर असलियत में, यह हमें और भी ज़्यादा अकेला कर रहा है क्योंकि यहाँ हर कोई अपनी एक 'आदर्श छवि' (Perfect Image) पेश करने की होड़ में लगा है। कोई भी अपनी उदासी, अपने डर या अपने संघर्ष को साझा नहीं करना चाहता।

​जब हम दूसरों की चमक-धमक देखते हैं, तो हमारे भीतर एक 'तुलना' शुरू हो जाती है। यही तुलना धीरे-धीरे हमारे आत्म-सम्मान (Self-esteem) को कम करती है। मेरी किताब 'Self-Love Symphony' में मैंने इसी बात पर ज़ोर दिया है कि खुद को स्वीकार करना ही इस बाहरी शोर से बचने का एकमात्र रास्ता है।

सुनने की कला का अंत

​हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ हर कोई बोलना चाहता है, चिल्लाना चाहता है, पर सुनना कोई नहीं चाहता। संवाद (Conversation) अब केवल अपनी बारी के इंतज़ार का नाम रह गया है। हम सामने वाले की बात इसलिए नहीं सुनते कि हम उसे समझना चाहते हैं, बल्कि इसलिए सुनते हैं ताकि हम उसे जवाब दे सकें।

​यही वजह है कि आज के दौर में एक 'Listener' (सुनने वाला) होना सबसे दुर्लभ और कीमती चीज़ बन गई है। किसी का हाथ थामकर यह कहना कि "मैं सुन रहा हूँ, तुम कहो", किसी भी महँगी दवा से ज़्यादा कारगर साबित होता है। शब्दों में वह शक्ति है जो घाव भर सकती है—यही मेरी लेखनी का मूल मंत्र है, "Words That Heal"

एक सुरक्षित जगह की तलाश

​मैंने 'Sukoon Talk' की नींव किसी व्यवसाय के तौर पर नहीं, बल्कि एक ज़रूरत के तौर पर रखी थी। मैं चाहता था कि एक ऐसी जगह हो जहाँ कोई भी व्यक्ति बिना किसी झिझक के, बिना किसी 'जजमेंट' के डर के अपनी बात रख सके। एक ऐसी जगह जहाँ उसे महसूस हो कि उसकी आवाज़ की कीमत है, उसकी भावनाओं का मूल्य है।

​अकेलापन कोई बीमारी नहीं है, यह बस एक संकेत है कि आपका मन किसी ऐसे इंसान को खोज रहा है जो आपकी रूह को बिना शर्त सुन सके।

यदि आप भी किसी अनकही बात को साझा करना चाहते हैं, तो आप मुझसे 'सुकून टॉक' के माध्यम से जुड़ सकते हैं।